Fri, 09 18, 2026
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धनूरी गांव की फौजी परंपरा: प्रथम विश्व युद्ध से कारगिल तक 17 शहीद, आज भी 300 जवान सेना में:

17 शहीदों की धरती पर रोजाना 50 से 100 युवा करते हैं सेना भर्ती की तैयारी, अग्निवीर में हाल ही में 12 युवाओं का चयन

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झुंझुनूं। राजस्थान के झुंझुनूं जिले से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित धनूरी गांव देशभक्ति और सैन्य परंपरा की अनूठी मिसाल है। करीब 4 से 4.5 हजार की आबादी वाले इस गांव ने प्रथम विश्व युद्ध से लेकर कारगिल युद्ध तक देश को 17 शहीद दिए हैं। गांव में आज भी करीब 300 जवान भारतीय सेना में सेवाएं दे रहे हैं, जबकि 250 से अधिक पूर्व सैनिक पेंशनधारक हैं।

सेना में जाना धनूरी के युवाओं के लिए सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा और गौरव का विषय है। हाल ही में अग्निवीर भर्ती में गांव के 12 युवाओं का चयन हुआ है, जबकि 30 युवा लिखित परीक्षा पास कर शारीरिक परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।

प्रथम विश्व युद्ध से कारगिल तक दी शहादत

धनूरी की सैन्य विरासत बेहद पुरानी है। प्रथम विश्व युद्ध में करीम बख्स खान, करीम खान और अजीमुद्दीन खान शहीद हुए थे। द्वितीय विश्व युद्ध में ताज मोहम्मद खान और इमाम अली खान ने देश के लिए बलिदान दिया।

1962 के भारत-चीन युद्ध में मोहम्मद इलियास खान, मोहम्मद सफी खान और निजामुद्दीन खान शहीद हुए। वहीं 1971 के भारत-पाक युद्ध में मेजर महमूद हसन खान, जाफर अली खान और कुतुबुद्दीन खान ने सर्वोच्च बलिदान दिया। कारगिल युद्ध में मोहम्मद रमजान खान ने वीरता के साथ लड़ते हुए शहादत दी।

चार-पांच पीढ़ियों से सेना में सेवा

धनूरी में कई परिवार ऐसे हैं, जिनकी चार से पांच पीढ़ियां लगातार भारतीय सेना में सेवाएं देती आ रही हैं। सेवानिवृत्त सूबेदार आमीन अली का परिवार इसकी मिसाल है। उनके परदादा से शुरू हुई देश सेवा की परंपरा पांचवीं पीढ़ी तक पहुंच चुकी है। उनके दोनों बेटे वर्तमान में सेना में तैनात हैं। एक कारगिल-द्रास सेक्टर और दूसरा कुपवाड़ा क्षेत्र में देश की रक्षा कर रहा है।

शहीद कुतुबुद्दीन खान का परिवार भी चार पीढ़ियों से सेना में सेवा कर रहा है। गांव के कई अन्य परिवारों में भी दादा, पिता, बेटे और पोते सेना में भर्ती होकर देश सेवा कर रहे हैं।

आठ भाइयों में सात ने पहनी सेना की वर्दी

शहीद मोहम्मद इलियास खान का परिवार भी धनूरी की सैन्य परंपरा का बड़ा उदाहरण है। उनके आठ भाइयों में से सात भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। वर्ष 1962 के युद्ध में मोहम्मद इलियास खान शहीद हो गए, लेकिन उनके परिवार की देश सेवा की परंपरा आगे भी जारी रही।

उनके बेटे अब्दुल हमीद बताते हैं कि 21 अक्टूबर 1962 को जब उनके पिता शहीद हुए, तब वे महज 15 महीने के थे। परिवार के लिए पिता की शहादत का दर्द हमेशा रहा, लेकिन देश सेवा का जज्बा कभी कम नहीं हुआ।

आठ गोलियां लगने के बाद भी टाइगर हिल पहुंचे

धनूरी के पूर्व सैनिक इकराज अहमद ने कारगिल युद्ध से जुड़ा अपना अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि शरीर में आठ गोलियां लगने और स्वास्थ्य कारणों से अनुमति नहीं मिलने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

कारगिल युद्ध के दौरान वे पैदल टाइगर हिल क्षेत्र तक पहुंचे और अपना दायित्व निभाया। उनका कहना है कि कायमखानी समाज हमेशा देश के नाम, नमक और निशान के लिए खड़ा रहा है और आगे भी देश सेवा के लिए तैयार रहेगा।

रोजाना 50 से 100 युवा करते हैं भर्ती की तैयारी

धनूरी में पूर्व सैनिक नई पीढ़ी को सेना में जाने के लिए तैयार कर रहे हैं। वरिष्ठ पूर्व सैनिक अली हसन खान, कैप्टन टीपू सुल्तान सहित अन्य पूर्व सैनिक रोजाना युवाओं को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन देते हैं।

गांव में सुबह और शाम करीब 50 से 100 युवा सेना भर्ती की तैयारी करते हैं। पूर्व सैनिक युवाओं को शारीरिक प्रशिक्षण के साथ सेना भर्ती से जुड़ी जरूरी जानकारी भी देते हैं।

अग्निवीर भर्ती में 12 युवाओं का चयन

गांव के शहीद मोहम्मद इलियास खान के पोते और झुंझुनूं कलेक्ट्रेट में सहायक प्रशासनिक अधिकारी साकिब हुसैन के अनुसार, हाल ही में अग्निवीर भर्ती में गांव के 12 युवाओं का चयन हुआ है। वहीं करीब 30 युवा लिखित परीक्षा पास कर चुके हैं और अब शारीरिक परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।

गांव में सेना के वर्तमान जवानों और पूर्व सैनिकों की बड़ी संख्या इसकी सैन्य परंपरा को दर्शाती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार करीब 300 जवान भारतीय सेना में सेवाएं दे रहे हैं और 250 से अधिक पूर्व सैनिक पेंशनधारक हैं।

शादी के एक साल बाद ही विधवा हुईं मुमताज

धनूरी में देश के लिए बलिदान देने वाले सैनिकों के परिवारों की त्याग की कहानियां भी कम नहीं हैं। शहीद जाफर खान की वीरांगना मुमताज बानो की शादी के महज एक साल बाद ही उनके पति देश के लिए शहीद हो गए थे।

धनूरी की गलियों में आज भी सेना की वर्दी, शहीदों की स्मृतियां और युवाओं की भर्ती की तैयारी इस बात की गवाही देती है कि यहां देश सेवा केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही विरासत है।

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