पाली। जिस उम्र में बच्चे खेल-कूद में अपना बचपन बिताते हैं, उस उम्र में गुंदोज गांव के रामप्रताप शर्मा ने माता-पिता का साया खो दिया। पैतृक जमीन पर जागीरदारों का कब्जा हो गया और कमजोर तबकों पर होने वाले अत्याचारों ने उनके मन में व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष का संकल्प पैदा किया।
जोधपुर में नेताजी सुभाषचंद्र बोस का भाषण सुनने के बाद उन्होंने पुलिस की नौकरी छोड़ दी और आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। आंदोलनों में लाठियां खाईं, जेल गए और आजादी के आंदोलन के साथ-साथ छुआछूत के खिलाफ भी मोर्चा खोला। उन्होंने दलित बच्चों के लिए किराए के मकान में राजस्थान की पहली दलित पाठशाला स्थापित की।
12 साल की उम्र में उठ गया माता-पिता का साया
पाली से करीब 20 किलोमीटर दूर गुंदोज गांव में रामप्रताप शर्मा का पुश्तैनी मकान है। परिवार के अनुसार, जब रामप्रताप महज 12 साल के थे, तब उनके माता-पिता का निधन हो गया। सामंती व्यवस्था के चलते उनकी पैतृक जमीन पर जागीरदारों ने कब्जा कर लिया।
इसके बाद उन्हें अपने ननिहाल बगड़ी में शरण लेनी पड़ी। वहां भी ननिहाल की जमीन सामंतों के कब्जे में थी। बचपन में ही उन्होंने गरीबी, अन्याय और सामंती व्यवस्था को करीब से देखा।
कमजोर तबके से मारपीट की घटना ने झकझोरा
वर्ष 1934 में बगड़ी में एक खुले दरबार के दौरान कमजोर तबके के लोगों के साथ बेरहमी से मारपीट की घटना ने रामप्रताप शर्मा को अंदर तक झकझोर दिया। इसी दौर में उन्होंने अपनी और नाना की जमीन को सामंतों के कब्जे से मुक्त कराने तथा अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का संकल्प लिया।
पुलिस की नौकरी में गए, लेकिन मन में आजादी की लड़ाई
रामप्रताप शर्मा भारतीय सेना में शामिल होकर देश सेवा करना चाहते थे, लेकिन उस दौर में भारतीय-ब्रिटिश सेना में ब्राह्मणों की भर्ती नहीं होती थी। इसके बाद उन्होंने पुलिस में हेड कॉन्स्टेबल के रूप में नौकरी शुरू की।
नेताजी का भाषण सुना और छोड़ दी नौकरी
वर्ष 1938 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस जोधपुर पहुंचे और आमसभा को संबोधित किया। उस समय सभा में कानून-व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी हेड कॉन्स्टेबल रामप्रताप शर्मा के पास थी।
नेताजी का भाषण सुनकर वे बेहद प्रभावित हुए। राष्ट्रभक्ति और स्वतंत्रता के लिए उनके विचारों ने रामप्रताप के जीवन की दिशा बदल दी। अगले ही वर्ष 1939 में उन्होंने पुलिस की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और गुंदोज लौटकर आजादी के आंदोलन तथा सामंती व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष शुरू कर दिया।
सत्याग्रह में हिस्सा लिया, दो साल जेल में रहे
रामप्रताप शर्मा मारवाड़ लोक परिषद से जुड़े और सत्याग्रह आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। जमनालाल बजाज और हीरालाल शास्त्री के मार्गदर्शन में चल रहे आंदोलनों में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
अंग्रेजी हुकूमत ने वर्ष 1943 में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। उन पर लूट सहित कई धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए। करीब दो साल जेल में रहने के बाद वर्ष 1945 में हाकिम रूपसिंह राठौड़ और गोरधन सिंह भंडारी ने उन्हें बरी कर दिया।
जेल से रिहा होने के बाद वे फिर गांव लौटे और किसान आंदोलन तथा जागीरदारी प्रथा के विरोध में सक्रिय हो गए।
छुआछूत के खिलाफ खोली राजस्थान की पहली दलित पाठशाला
आजादी की लड़ाई के साथ रामप्रताप शर्मा ने सामाजिक भेदभाव के खिलाफ भी संघर्ष किया। उस दौर में गुंदोज की पाठशाला में दलित बच्चों को प्रवेश नहीं दिया जाता था। ऐसे बच्चों की शिक्षा के लिए उन्होंने वर्ष 1945 में सेठ पुखराज जैन का मकान किराए पर लेकर दलित पाठशाला शुरू की।
पाठशाला में पढ़ाने की जिम्मेदारी उन्होंने अपने छोटे भाई मगराज शर्मा को दी। मगराज ने सरकारी शिक्षक की नौकरी छोड़कर इस पाठशाला में बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।
आज वही पाठशाला सरकारी स्कूल बन चुकी है
देश की आजादी के बाद वर्ष 1955 में रामप्रताप शर्मा ने इस पाठशाला को गांव के बस स्टैंड के पास बने अंग्रेज अफसरों के बंगलों में स्थानांतरित कर दिया। समय के साथ यही पाठशाला विकसित होकर आज राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, गुंदोज के रूप में संचालित हो रही है।
दलित बेटी को परिवार की तरह पाला, फिर कराई शादी
रामप्रताप शर्मा ने केवल शिक्षा के क्षेत्र में ही सामाजिक भेदभाव के खिलाफ काम नहीं किया, बल्कि अपने निजी जीवन में भी इसका उदाहरण पेश किया। परिवार के अनुसार उन्होंने एक दलित लड़की को अपनी बेटी की तरह पाला, उसे शिक्षित किया और बाद में उसकी शादी भी कराई।
परिवार का कहना है कि उस परिवार से आज भी उनके संबंध बने हुए हैं और दोनों परिवार एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं।
गांव के पहले सरपंच और कांग्रेस के जिलाध्यक्ष बने
आजादी के बाद रामप्रताप शर्मा सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहे। वे गुंदोज गांव के पहले सरपंच बने। परिवार के अनुसार वर्ष 1954 में वे कांग्रेस के पहले जिलाध्यक्ष भी बने।
उन्होंने गांव और आसपास के क्षेत्रों में छुआछूत निवारण अभियान चलाया। जयनारायण व्यास और मथुरादास माथुर के मार्गदर्शन में वे पाली जिले के कई गांवों में पैदल जाकर सामाजिक जागरूकता का संदेश देते थे।
आज भी परिवार संभाल रहा विरासत
रामप्रताप शर्मा के पोते महेश जोशी और भतीजे बद्रीलाल जोशी आज भी गुंदोज में रहते हैं। परिवार के पास स्वतंत्रता सेनानी की तस्वीरें और उनसे जुड़ी कई स्मृतियां सुरक्षित हैं।
रामप्रताप शर्मा की जिंदगी की कहानी केवल स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं थी। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष के साथ सामंती व्यवस्था और छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी आवाज उठाई। उनकी स्थापित पाठशाला आज भी शिक्षा की रोशनी फैला रही है और यही उनकी सबसे बड़ी विरासत मानी जाती है।
