पिंकसिटी जयपुर के जवाहर कला केंद्र में समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले का संघर्ष बुधवार की शाम मंच पर देखने को मिला | कलाकार शुभांगी और शिल्पा ने विभिन्न पात्रों को मंच पर सरकार किया | मौका था जवाहर कला केंद्र की ओर से "अक्टूबर उमंग : लोक संस्कृति संग" थीम पर कला संसार मधुरम के अंतर्गत नाटक "हाँ मैं सावित्रीबाई फुले" के मंचन का | जानकारी के लिए आपको बता दें कि यह नाटक सुषमा देशपांडे के निर्देशन में खेला गया | चंचल स्वभाव की छोटी सावित्री जिसे एहसास नहीं है कि भविष्य में उसे समाज को दिशा देने में कितनी बड़ी भूमिका निभानी है | सावित्री इमली और जामुन तोड़ती है | मां मिट्टी के चूल्हे पर खाना पकाने को कहती है तो वह मिट्टी से खेलना शुरू कर देती है | समय करवट लेता है और सावित्री का विवाह ज्योतिराव फुले से हो जाता है | पढ़ने लिखने में अव्वल ज्योति कुरीतियों से ग्रस्त तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ मुखर रहते हैं,उन्हें काफी विरोध का सामना करना पड़ता है | वह सावित्री को कहते हैं कि अन्याय के विरुद्ध तुम मेरा साथ दोगी ना सावित्री ! यहीं से उनकी अर्धांगिनी सावित्री उनके संघर्ष को भी आधा बांट लेती है | मैं पढ़ूंगी, लिखूंगी, मैं सीखूंगी इस ध्येय के साथ सावित्री अपने पति के संग घर पर पढ़ने लगती है | घर से सीख कर सावित्री स्कूल में महिलाओं को पढ़ाती है | विरोध का सामना करने के बाद भी सावित्री शिक्षा की मशाल हाथ में लेकर निकल पड़ती है | स्कूल के लिए जाते समय सावित्री से अपशब्द कहे जाते हैं ,उस पर कीचड़ फेंका जाता है, पत्थर फेक जाते हैं, लेकिन निर्भीक सावित्री और ज्योतिराव अपने पथ से तनिक भी नहीं डगमगाते हैं | सावित्रीबाई और ज्योतिराव दोनों ही सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जंग लड़ते-लड़ते जिंदगी को विदा कहते हैं | दोनों ने शिक्षा की जो अलख जगाई उसके तेज से समाज आज भी दीप्तिमान है |
