सभी दल हर चुनाव में गांव, खेत और किसान का मुद्दा जोर-शोर से उठाते हैं। हर चुनाव में किसानों को सरसब्ज सपने दिखाते हैं, लेकिन चुनाव के बाद किसानों का मुद्दा गायब हो जाता है। पांच साल बाद फिर वहीं पुराने मुद्दों पर किसानों को लुभाने का जतन शुरू हो जाता है। प्रदेश की राजनीति में किसान मतदाताओं की अहम भूमिका होती है, लेकिन किसान संगठन भी राजनीति के चक्रव्यू में फंस जाते हैं। भाजपा और कांग्रेस ने पिछले चुनाव में किसानों के जिन मुद्दों पर वोट मांगे थे, वह मुद्दे और समस्याएं आज भी जस की तस है। चुनाव के बाद किसानों के मुद्दों को भुला दिया जाता है। 2018 के विधानसभा चुनाव में किसानों के जो मुद्दे उठाए गए थे, उनकी जमीनी हकीकत जानी तो सामने आया कि आज भी स्थिति जस की सत है। नेता और जनप्रतिनिधियों ने किसानों के मुद्दों पर सिर्फ राजनीति की, समाधान की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए हैं।
यह थे प्रमुख मुद्दे
किसानों को सिंचाई के लिए नहर से पानी नहीं मिल पाता, फसल के उचित दाम नहीं मिलते। मंडी में फसल बेचने में दो से तीन दिन का इंतजार करना पड़ता है। गांव में ही खरीद केन्द्र स्थापित हों।
बलराम
पिछले चुनाव में सिंचाई के लिए आठ घण्टे बिजली देने का वादा किया था, लेकिन चार घण्टे भी बिजली नहीं मिल रही है। नहरों के टेल तक पानी नहीं पहुंच पाता है।
गोविंद लाल
भारतमाला परियोजना से किसानों को बरसात के दिनों में बड़ी समस्या का सामना करना पड़ता है। ड्रेनेज सिस्टम सही नहीं होने से खेतों व रास्तों में पानी भर जाता है।
के.के. धाकड़
फसल खराबे का मुआवजा नहीं मिल पाता है। परवन वृहद सिंचाई परियोजना का कार्य काफी धीमी गति से चलने से इसका किसानों को फायदा नहीं मिल पा रहा।
सत्यनारायण सिंह
