Thu, 07 23, 2026
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नर्मदा आने से छाई हरियाली, संवरी किसानों की तकदीर:

उपज उत्पादन में इजाफा, किसानों की आमदनी बढ़ी

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नर्मदा नहर परियोजना का नीर आने के बाद उपखंड क्षेत्र के खेतों हरीतिमा छाई हुई है। खेतों में लहलहाती फसलों को देखकर किसानों के चेहरों पर मुस्कान नजर आ रही है। कभी पेयजल की समस्या से झेलने वाले रेतीले धोरे आज हरियाली से आच्छादित है। नर्मदा के नीर ने यहां के किसानों की तकदीर बदल दी है।

कृषि क्षेत्र में नई तकनीक के चलते किसान खुशहाल है। यहां के किसान अब साल में तीन बार फसले ले रहे है। किसान उनालू सीजन में बाजरा, ज्वार, रजका बाजरी, सीयालू सीजन में गेहूं, जीरा, सरसो, मैथी, अजवायन, सौंफ, आलू, प्याज, गोभी, मटर, टमाटर, पालक, भिण्डी व खरीफ सीजन में बाजरा, मोठ, मूंग, मतीरा, तिलहन, ग्वार, ज्वार की फसल ले रहे है। वहीं क्षेत्र में किसान बादाम, अनार, चीकु, पपीता, खजुर, तरबुज जैसे उत्पादन ले रहे है। किसान सागवान के पौधे लगाकर इमारती लकड़ी भी प्राप्त कर रहे है।

बुवाई का क्षेत्र बढ़ा

क्षेत्र में नर्मदा नहर आने के बाद क्षेत्र में कृषि का रकबा भी बढ़ा है। वहीं उत्पादन बढऩे से किसान भी खुशहाल है। नर्मदा नहर के आने के बाद अगर बुवाई के आंकड़ों पर नजर डाले तो दोगुना से ज्यादा बुवाई का रकबा बढ़ा है। सांचौर लिफ्ट कैनाल जो 46 किमी लंबी है। जिस पर करीब 20 हजार हैक्टेयर भूमि को प्रांरभ में सिंचित करने का लक्ष्य था। लेकिन बुवाई व सिंचाई इससे अधिक क्षेत्र में हो रही है।

बूंद.बूंद सिंचाई पद्धति रास आई

नर्मदा नहर परियोजना के पानी आने से किसानों को बागवानी खेती में बूंद.बूंद खेती काफी रास आ रही है। जिसके द्वारा किसान अनार, बादाम, चिकू, पपीता, तरबूज व खजूर की पैदावार ले रहे है। वहीं दूसरी तरफ किसान फव्वारा पद्धति से जीरा, रायड़ा, गेहूं सहित अन्य फसल ले रहे है। रबीए खरीफ व उनालू फसल की सिंचाई की जाती है।

अफीम के लिए उपयुक्त

क्षेत्र के किसानों की माने तो यहां वातावरण व मिट्टी अफीम की खेती के लिए उपयुक्त है। अगर किसानों को यहां अफीम की खेती के पट्टे दिए जाए तो प्रदेश को राजस्व आय होगी। वहीं किसानों की आर्थिक स्थिति भी अच्छी होगी। यहां पूर्व में भी अफीम की खेती के पट्टे दिलवाने के लिए तत्कालीन विधायक जीवाराम चौधरी ने राज्य सरकार से मांग की थी।

कृषि अनुसंधान केन्द्र की दरकरार

आस पास कृषि अनुसंधान केन्द्र नहीं होने से किसान आधुनिक खेती पद्धति का सही उपयोग नहीं कर पा रहे है। जालोर के केशवना में स्थित कृषि अनुसंधान केंद्र भी यहां से काफी दूर होने से स्थानीय किसान खेती की नई तकनीकी की जानकारी के लिए वहां नहीं जा पाते है। वहीं सांचौर क्षैत्र के नजदीक दूसरा अनुसंधान केन्द्र नहीं होने से किसानों को विभिन्न तकनीकी जानकारी नहीं मिल पाती है।

 

 

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