इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) मद्रास अक्टूबर 2023 में तंजानिया के जांजीबार में पहला अंतरराष्ट्रीय कैंपस खोलने जा रहा है। इस कैंपस की डायरेक्टर-इन-चार्ज की कमान प्रीति अघालयम संभालेंगी।
वह न केवल आईआईटी जांजीबार की पहली महिला डायरेक्टर-इन-चार्ज हैं बल्कि आईआईटी की ही पहली महिला डायरेक्टर-इन-चार्ज हैं।
कर्नाटक के मैसूर में जन्मीं प्रीति अघालयम का आईआईटी मद्रास से पुराना रिश्ता रहा है। उन्होंने 1995 में यहीं से केमिकल इंजीनियरिंग में बीटेक की थी। अब वह 21 साल से प्रोफेसर हैं।
'ये मैं हूं' में जानिए प्रोफेसर प्रीति अघालयम का सफल सफर:
पापा, दादा और मां को देख प्रोफेसर बनने का सोचा
मुझे बचपन से साइंस में दिलचस्पी रही है। पापा केमिस्ट्री के प्रोफेसर रहे हैं। दादाजी भी एकेडमिक्स से जुड़े रहे। वह राइटर रहे हैं। उन्हें देख मैंने भी एक किताब लिखी।
पापा को टीचिंग बहुत पसंद रही है। जब मैं हाईस्कूल में थी तब मां ने 45 की उम्र में पीएचडी की। मां की मेहनत को देख मैं बहुत प्रभावित हुई।
मैंने इन सभी लोगों से प्रोफेसर बनने की प्रेरणा ली। मैं बचपन में ही तय कर चुकी थी कि मुझे साइंटिस्ट या प्रोफेसर बनना है। मैंने अपना फोकस इसी फील्ड पर रखा।
मेरा मानना है कि अगर दिमाग पहले से ही क्लीयर हो तो लक्ष्य आसानी से हासिल किया जा सकता है। किताबें बचपन से ही मेरी दोस्त रहीं।
प्रिंसिपल साइंटिफिक एडवाइजर ऑफिस ने STEM में 75 प्रभावशाली महिलाओं में प्रोफेसर प्रीति अघालयम को भी चुना।
JEE में आई रैंक तो सबने कहा-बेटी को IIT भेजो
12वीं के बाद जब JEE में रैंक मिली तो मैं केमिकल इंजीनियरिंग करना चाहती थी। JEE में रैंक का मतलब है, आईआईटी में जाने का पूरा मौका है। मेरे पेरेंट्स ने काफी लोगों से इस बारे में बात की और सभी ने इसे सुनहरा अवसर बताया।
पेरेंट्स ने 1991 में मुझे चेन्नई भेज दिया। आईआईटी मद्रास से जब मैं केमिकल इंजीनियरिंग में बीटेक कर रही थी तो मुझे बहुत मजा आया। यहां का माहौल, अच्छी फैकल्टी और एजुकेशन क्वालिटी वर्ल्ड क्लास है। शायद इसलिए मैं 21 साल से पढ़ा रही हूं।
पीएचडी करना आसान नहीं है
मैंने 2000 में यूनिवर्सिटी ऑफ मैसेचुसेट्स से पीएचडी की। पीएचडी में एडमिशन लेने के 1 साल बाद ही मेरी शादी हो गई।
पीएचडी करना एक जबरदस्त जिम्मेदारी और मेहनत से भरा टास्क है। इसमें बहुत समय लगता है। कई बार मन में आता है कि रिसर्च खत्म ही नहीं हो रही। हम क्या कर रहे हैं? रिसर्च में यह भी नहीं पता होता कि जिन सवालों के जवाब हम तलाश कर रहे हैं, वह मिलेंगे भी या नहीं। एग्जाम देने के मुकाबले रिसर्च बहुत मुश्किल है। मैंने भी ऐसा ही महसूस किया लेकिन सफलता कई साल की गई मेहनत और थकान को खुशियों में बदल देती है
करियर की शुरुआत में हुई बेटी
मैंने आईआईटी बॉम्बे में असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर करियर ही शुरू किया, तभी मेरी बेटी हो गई।
मुझे बच्चों को पढ़ाने की प्रैक्टिस तो थी लेकिन न्यू मॉम की प्रैक्टिस नहीं।
यह मेरे लिए बहुत बड़ा चैलेंज था। मुझे लगता है कि करियर के साथ बेबी को संभालना किसी भी मां के लिए आसान नहीं होता। लेकिन मैं खुद को बहुत लकी मानती हूं कि मुझे हमेशा अपने हस्बैंड और फैमिली का सपोर्ट मिला।
केमिकल इंजीनियरिंग में बढ़ानी है महिलाओं की संख्या
आईआईटी मद्रास में कई इनोवेशन होते हैं। हमने 2 साल तक जेंडर एडवांसमेंट पर गहराई में जाकर रिसर्च की। मैं इसमें नोडल ऑफिसर बनी। इसका लक्ष्य अकैडमिक्स में लड़के-लड़कियों की एक जैसी भागीदारी थी। दरअसल केमिकल इंजीनियरिंग में लड़कियों की संख्या बहुत कम है। जब मैं पीएचडी कर रही थी तब 15 लोगों में 2-3 लड़कियां ही थीं। आज भी इस फील्ड का यही हाल है।
मुझे लगता है कि इस फील्ड में महिलाएं भी अधिक संख्या में होनी चाहिए। हमारी सोसाइटी एक जैसी नहीं है इसलिए हम महिला रिसर्च स्कॉलर की सुविधाओं के बारे में सोच रहे हैं।
केमिकल इंजीनियरिंग के बारे में लोगों की गलत धारणा
समाज में यह धारणा है कि केमिकल इंजीनियरिंग मैकेनिकल इंजीनियरिंग की तरह है। इसमें लड़कियों का कोई काम नहीं है। यह कोर्स लड़कियों के लिए ठीक नहीं, इस फील्ड में नौकरियां नहीं हैं। जबकि यह सोच गलत है। इस सब्जेक्ट में भी रोजगार के कई अवसर हैं।
इसमें रिसर्च, अकैडेमिक, इंडस्ट्रियल जॉब्स के साथ-साथ एंटरप्रिन्योरशिप करके आगे बढ़ने के कई सुनहरे अवसर हैं। अब लोग खुद केमिकल इंजीनियरिंग कर अपनी कंपनी सेटअप कर रहे हैं।
समाज जो भी सोचे लेकिन लड़कियों को खुद पर भरोसा होना चाहिए। उन्हें अपनी काबिलियत पर शक नहीं होना चाहिए। वह इतनी काबिल हैं कि केमिकल इंजीनियरिंग कर आगे बढ़ सकती हैं।
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महिलाओं के लिए अब बढ़ रही सुविधाएं
आईआईटी मद्रास में 67 विभाग हैं और 650 फैकल्टी रिसर्च कर रही हैं। महिलाएं भी इनका हिस्सा बन सकती हैं। इसके लिए महिलाओं के बीच जागरूकता बेहद जरूरी है। अब महिलाओं के लिए रोजगार के अच्छे अवसर हैं और सुविधाएं भी।
महिलाओं को इस फील्ड में मोटिवेट करने के लिए हम अवॉर्ड देते हैं। उनकी रिसर्च की सराहना की जाती है।
पीएचडी करने के दौरान अगर किसी महिला को बेबी होता है तो उन्हें 6 महीने की मैटरनिटी लीव भी मिलती है। उन्हें एक्स्ट्रा टाइम देने का साथ-साथ 6 महीने का स्टाइपन भी देते हैं। जबकि पीएचडी में 5 साल के बाद स्टाइपन देना बंद हो जाता है।
महिलाएं पीएचडी में आगे आएं और अपनी रिसर्च पूरी करें, इसलिए हमने यह कदम उठाए हैं।
आईआईटी जांजीबार को रिप्रेजेंट करना एक चैलेंज
अक्टूबर से जांजीबार में 2 कोर्स शुरू किए जाएंगे। एक डायरेक्टर होने के नाते मेरे लिए काफी चैलेंज हैं। इस कैंपस को 1 साल के लिए नहीं, हजारों सालों के लिए आगे लेकर जाना है। मैं वहां आईआईटी मद्रास को रिप्रेजेंट करूंगी तो दबाव तो है ही। वहां फैकल्टी बनाना, कैंपस तैयार करना, उसमें स्टूडेंट्स की रहने की व्यवस्था करना, स्टूडेंट्स को एडमिशन के लिए चुनना… सब मैनेज करना होगा। समय कम है, काम ज्यादा और जिम्मेदारी बहुत बड़ी।
वहां एक क्लासरूम में कई देशों के स्टूडेंट शामिल होंगे। उन्हें बेस्ट क्वालिटी की एजुकेशन देनी है। इसलिए बहुत स्मार्ट तरीके से काम करना होगा।
आईआईटी मद्रास के जांजीबार कैंपस में प्रोफेसर प्रीति अघालयम ने किया दौरा
बेटी की डिग्री कोई छीन नहीं सकता
चूंकि मैं प्रोफेसर हूं इसलिए कई लोग मुझसे अपनी बेटी की एजुकेशन से जुड़ी सलाह लेते हैं। मेरी सभी पेरेंट्स को एक सलाह है कि अपनी बेटियों को पढ़ाएं और उन्हें काबिल बनाएं क्योंकि आपकी बेटी की डिग्री एक ऐसी चीज है जो उससे कोई नहीं छीन सकता।
बेटियां किसी की नकल करने या किसी को फॉलो करने के लिए नहीं बनीं। वो अपनी काबिलियत तलाशें, अपना लक्ष्य खुद बनाएं और उसे हासिल करें।
हर लड़की को पता होना चाहिए कि उनके लिए क्या अच्छा है और क्या गलत।
मुझे खुशी है कि आज की लड़कियां बहुत बहादुर हैं। वह खुद ही पेरेंट्स को बोल देती हैं कि हमें आगे पढ़ना है। अभी शादी नहीं करनी।
