करगिल में ऑपरेशन विजय चल रहा था। हर पहाड़ बर्फ से ढके हुए थे। सबसे बड़ी परेशानी थी हम नीचे थे और दुश्मन हमसे कई हजार फीट ऊपर थे। उन्होंने बंकर बनाकर खुद को सुरक्षित कर लिया था। मैं इंफैंट्री स्कूल महू का बेस्ट शूटर रह चुका। मुझे युद्ध के मोर्चा पर आगे रखा गया। मझाऊ गांव निवासी रिटायर्ड कैप्टन सीताराम धींवा ने इंफैंट्री डे पर ऑपेरशन विजय के संस्मरण साझा करते हुए बताया कि 109 इंफैंट्री ब्रिगेड केंजवाल में आठ जाट रेजीमेंट को लगा रखा था। मैं इसी रेजीमेंट में तैनात था। मेरे पास स्नाइपर राइफल थी। इसका मैं एक्सपर्ट था। इसकी विशेषता है कि बहुत दूर बैठे दुश्मन पर सटीक निशाना साधा जा सकता था। हम त्रिशूल पहाडी पर चढाई कर रहे थे। पहाड़ी की ऊंचाई उन्नीस हजार फीट के लगभग है। हम ज्यों ही ऊपर चढने का प्रयास करते, वे कभी गोलियां बरसाते तो कभी गोले। लेकिन हमने हिम्मत नहीं हारी। ना परिवार की चिंता की, ना ही भूख व प्यास की।
1971 के भारत-पाक युद्ध के समय ग्राम पंचायत संजय नगर की ढाणी आशाका वाली निवासी सूबेदार सुमेर सिंह की डयूटी जम्मू कश्मीर के पूंछ -राजौरी क्षेत्र के नोसेरा में थी। युद्ध के संस्मरण सुनाते हुए उन्होंने बताया कि दिन में वे पहाड़ियों में छिपे रहते थे तथा रात्रि में दुश्मन पर हमला करते थे। उनके पास भोजन के लिए मीठे व नमकीन खुरमला होते थे। वह 17 दिनों तक खुरमला खाकर जंग लड़ते रहे । अब तक 73 बसंत देख चुके सूबेदार ने बताया कि उनको ना भोजन की चिंता थी ना परिवार की। चिंता बस एक ही थी सरहद की रक्षा करना और दुश्मन की पोस्ट पर तिरंगा फहराना। इस दौरान उनकी बटालियन ने तीन पोस्टों पर तिरंगा फहराया था। सुमेर सिंह को वीरता के लिए अलग-अलग समय कुल बारह पदकों से सम्मानित किया गया।
सूखी पुरी खाई पर हिम्मत नहीं हारी
करगिल में छिड़ी जंग के संस्मरण सुनाते हुए उदयपुरवाटी उपखंड के कैरोठ गांव निवासी शेर सिंह यादव ने बताया कि जब करगिल की पहाड़ियों में दुश्मन ने कब्जा जमा लिया था, तब मेरी ड्यूटी हैदराबाद में थी। मैं 22 ग्रेनेडियर अल्फा कंपनी में तैनात था। जंग शुरू हो चुकी थी, हमें भी वहां से करगिल में बुला लिया गया। करगिल क्षेत्र के बटालिक हैलमिट व जुबेर हिल पर तैनात रहा। आठ जुलाई 1999 को मोर्चा संभाला। दुश्मनों के ठिकानों को नष्ट करते हुए हम आगे बढ़ते गए। युद्ध के समय 8 दिन तक सूखी पुरी खाकर भूख मिटाई, लेकिन हिम्मत कम नहीं होने दी। युद्ध में असली विजय तब ही मानी जाती है जब पैदल सेना वहां पहुंचती है। यादव को वीरता पर कई बार सम्मानित भी किया गया।
गोली लगते ही दुश्मनों में मची खलबली
धींवा ने बताया, अठारह जुलाई 1999 को जंग तेज हो गई। वे ऊपर होने के कारण हमारे पर भारी पड़ रहे थे। एक ही रास्ता था, कैसे भी उनके बंकर को नष्ट किया जाए। दुश्मन के ऑब्जर्वेशन पोस्ट का अधिकारी हमारी हर गतविधि खुद के अफसरों को बता रहा था। हम बर्फ में छिपकर आगे बढ़ते गए। मैं बर्फ से निकला। लगभग 1200 मीटर दूर से अपनी स्नाइपर राइफल से दुश्मन के ऑब्जर्वेशन पोस्ट के अधिकारी को मार गिराया। गोली उसकी पीठ में लगी। उसके मरते ही दुश्मनों में खलबली मच गई। इसके बाद साथियों के साथ मिलकर 25 जुलाई को दुश्मन के पूरे बंकर को नष्ट कर दिया। कुछ वहीं मारे गए, जो जिंदा थे वे पीठ दिखाकर भाग गए। हालांकि इस पहाड़ी पर विजय करने के लिए हुई जंग में झुंझुनूं के ही आठ जाट रेजीमेंट के वीर शीशराम गिल सहित पांच साथी मां भारती के लिए शहीद भी हो गए थे। आखिरकार 26 जुलाई को वह दिन भी आया जब हमने त्रिशूल पहाडी पर तिरंगा लहरा दिया।
दादा व बेटा भी सेना में
धींवा ने बताया, दुश्मन को मार गिराने पर मुझे आर्मी कमांडर ने सम्मानित किया। इनके अलावा भी कई सम्मान मिले। कैप्टन पद से रिटायर होने के बाद धींवा अपने पैतृक गांव मझाऊ व झुंझुनूं के रामनगर में युवाओं को सेना भर्ती के टिप्स दे रहे हैं। धींवा ने बताया कि उनके दादा गिदा राम भी सेना में थे। अब बेटा संदीप धींवा सेना में हवलदार पद पर रहकर देश की सेवा कर रहा है।
जानें क्या है इन्फैंट्री डे
आजादी के बाद पाकिस्तान ने कश्मीर को हड़पने की योजना बनाई। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने 5 हजार आक्रमणकारियों को कश्मीर में घुसपैठ करके कब्जा करने के लिए भेजा था। तब कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह ने मदद मांगी। उसके बाद भारतीय सेना 27 अक्टूबर, 1947 को बडगाम हवाई अड्डे पर उतरी। पाकिस्तानी आक्रमणकारियों से भारत की सरहद की रक्षा की थी। इस दिन को इन्फैंट्री दिवसद्य के रूप में मनाया जाता है।
